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चिर प्रतीक्षा पूर्ण जैसे हो रही थी अब हमारी शिव मिले थे तपलीन, अपर्णा थी बेचारी एक बिजली छू गई उद्विग्न हृदय को इस तरह शशि निकल आए हों जैसे, थी अमावस अँधियारी.. तुम भी कुछ उलझे हुए थे संसार के संघर्ष में मग्न थे अपनी ही धुन में, अपने ही निज विमर्श में फिर अचानक दृग तुम्हारे मेरे नयन से जा मिले मिल गया वरदान जैसे, हुई तपस्या पूर्ण हमारी.. क्या याद है क्षण जब तुमने मुझे अपना कहा था रख मेरे अधरों पर निज अधरों से, प्रेम प्रमाण दिया था जानती है वह रात और बस गगन की तारिकाएँ लाज से उस क्षण हृदय की क्या परिस्थिति थी हमारी.. रात्रि के अंतिम प्रहर में प्रिय तुम न हमसे दूर जाना तुम्हारे चरणों में लिखूँ मैं प्रेम का कोई एक गाना गीत का अस्तित्व गायक के बिना कुछ भी नहीं है बन जाओ तुम राग इसमें और कविता हो हमारी.. मैं भुला दूँ भूत अपना और तुम गुजरा जमाना यदि बनो मोती प्रिए तुम सीप मुझको ही बनाना संसार की इस अग्नि में यह प्रेम कोमल जल न जाए उससे पहले साध लो यह मूर्ति है मन की तुम्हारी.. चिर प्रतीक्षा पूर्ण जैसे हो रही थी अब हमारी.. ©डॉ. सुनील